Home National संघ ने मोदी को किस तरह बनाया ‘फायर ब्रांड’, जानिए मोदी और RSS के रिश्तों की पूरी कहानी

संघ ने मोदी को किस तरह बनाया ‘फायर ब्रांड’, जानिए मोदी और RSS के रिश्तों की पूरी कहानी

by Rishi
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PM Modi-RSS Relations: 1980 का दशक आया जब RSS ने देखा कि भाजपा को मजबूत करने के लिए अपने लोग चाहिए, सो मोदी को भाजपा में भेज दिया गया. गुजरात में वो संगठन को मजबूत करने में जुट गए.

PM Modi-RSS Relations: पच्चीस साल के बाद कोई भारत का प्रधानमंत्री राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के राष्ट्रीय कार्यालय पहुंचा है. इससे पहले अटल बिहारी वाजपेयी बतौर प्रधानमंत्री संघ के दफ्तर में 27 अगस्त साल 2000 को पहुंचे थे. लेकिन पीएम मोदी और संघ के रिश्ते कोई नए नहीं हैं. पीएम मोदी आज दुनियाभर में भारत की धाक जमा रहे हैं. देश के प्रधानमंत्री के रूप में उनकी कहानी से हर कोई प्रेरणा लेता है. लेकिन ये कहानी सिर्फ उनकी नहीं, बल्कि उस संगठन की भी है जिसने उन्हें बनाया, संवारा और फिर उनके साथ रिश्तों में उतार-चढ़ाव देखे, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी RSS. ये कहानी है दोस्ती की, तकरार की, और उस बदलते वक्त की, जब दोनों ने एक-दूसरे को मजबूत किया, फिर धीरे-धीरे दूरी भी बनाई. चलिए विस्तार से समझने का प्रयास करते हैं इस कहानी को..

Narendra Modi speech in RSS campaign - Live Times

बचपन में ही कर दी थी शाखा जाने की शुरुआत

नरेंद्र मोदी का जन्म 1950 में गुजरात के वडनगर में हुआ. घर की हालत ऐसी कि चाय बेचनी पड़ती थी, लेकिन 8 साल की उम्र में एक दिन वो RSS की शाखा में पहुंच गए. शाखा वो जगह थी जहां खाकी निक्कर पहनकर बच्चे-बड़े देशभक्ति के गीत गाते थे, राष्ट्रभक्ति के खेल खेलते थे और हिंदुत्व की बातें सुनते थे. छोटे नरेंद्र को ये सब भा गया. धीरे-धीरे वो नियमित आने लगे. फिर क्या, 1970 के दशक में तो वो पूरे टाइम प्रचारक ही बन गए. RSS के लिए दिन-रात एक कर दिया. उस वक्त RSS उनके लिए मां-बाप, गुरु, सब कुछ था और RSS को भी लगा ये लड़का कुछ बड़ा करेगा.

1980 का दशक आया जब RSS ने देखा कि भाजपा को मजबूत करने के लिए अपने लोग चाहिए, सो मोदी को भाजपा में भेज दिया गया. गुजरात में वो संगठन को मजबूत करने में जुट गए. 1995 में जब भाजपा ने पहली बार गुजरात में सरकार बनाई, तो उसमें मोदी की मेहनत साफ दिखी. फिर 2001 में गुजरात का भूकंप आया, सरकार डगमगाई, और RSS ने कहा “मोदी को आगे करो.” बस, यहीं से शुरू हुई असली कहानी.

2002 के दंगों में संघ कैसे बना मोदी की ढाल

2001 में मोदी गुजरात के CM बने. लेकिन 2002 में गुजरात दंगे भड़क उठे. दुनिया भर में मोदी की आलोचना हुई. लोग उन्हें “मुस्लिम-विरोधी” कहने लगे. लेकिन RSS पीछे नहीं हटा, संघ ने कहा “ये हिंदुओं का जागरण है, मोदी सही हैं.” उस वक्त RSS मोदी के लिए ढाल बन गया, संगठन के स्वयंसेवकों ने हर जगह उनका बचाव किया. रिश्ता इतना गहरा था कि मोदी को RSS की हर बात माननी पड़ती थी. लेकिन ये वो दौर था जब मोदी सिर्फ RSS के सिपाही थे. अभी “मोदी” ब्रांड बनना बाकी था.

Narendra Modi speech to unity organization strength. - Live Times

2014 में RSS ने “मोदी” को बनाया ब्रांड

2013 में RSS ने फैसला किया कि मोदी को PM बनाना है. लालकृष्ण आडवाणी नाराज थे, लेकिन संघ ने अपनी ताकत झोंक दी. 2014 का चुनाव आया, RSS के लाखों स्वयंसेवक गांव-गांव गए. “मोदी लाओ, देश बचाओ” का नारा गूंजा. बूथ मैनेजमेंट से लेकर वोटर लिस्ट तक, सब RSS ने संभाला. नतीजा? भाजपा को 282 सीटें मिलीं, पहली बार पूर्ण बहुमत और मोदी PM बने.

लेकिन सत्ता में आने के बाद रिश्ते बदलने लगे. RSS को लगता था कि मोदी उनकी बात मानेंगे, जैसे पहले मानते थे. लेकिन अब मोदी का अपना स्टाइल था. वो “सबका साथ, सबका विकास” की बात करने लगे. मुस्लिम देशों से दोस्ती बढ़ाई. RSS के कुछ नेताओं को ये पसंद नहीं आया. फिर भी, वो चुप रहे क्योंकि मोदी की जीत उनकी भी जीत थी. RSS ने उन्हें ब्रांड बनाया था, चायवाले से लेकर दुनिया के बड़े नेताओं तक की जुबान पर “मोदी-मोदी” गूंज रहा था. लेकिन अब सबकुछ बदलने वाला था. मोदी के साथ संघ की तल्खियों की खबरें सामने आने लगी.

RSS proposed Narendra Modi name in 2024 election - Live Times

आरक्षण पर संघ से अलग रहा है मोदी का नजरिया

RSS शुरू से आरक्षण के खिलाफ था, संघ के बड़े नेता कहते थे “ये समाज को बांटता है.” लेकिन पीएम मोदी को सत्ता में देखकर उन्हें समझ आया कि दलित-ओबीसी वोट चाहिए. 2019 में मोदी ने कहा “जब तक मैं हूं, आरक्षण को हाथ नहीं लगेगा.” इस पूरे मामले पर RSS चुप रहा. फिर 2023-24 में संघ के बड़े नेता मोहन भागवत बोले “आरक्षण तब तक रहेगा, जब तक असमानता है.” ये क्या था किसी को समझ नहीं आया. संघ अपनी विचारधारा से क्या धीरे-धीरे अब पीछे हटने लगा है या इसके पीछे कहानी कुछ और ही है. राजनीति की अच्छी समझ रखने वाले बताते हैं कि ये बदलाव मोदी की वजह से था. वो जानते थे कि मोदी की लाइन से हटना मतलब वोट खोना है.

2024 में झटका लगने के बाद फिर बढीं संघ से नजदीकियां

2024 का लोकसभा चुनाव आया जहां भाजपा को बहुमत से कम 240 सीटें मिलीं. इसपर RSS भड़क गया, कहा “अति आत्मविश्वास और सहयोगियों की अनदेखी ने ये हाल किया है”. पहली बार RSS ने खुलकर Modi सरकार की आलोचना की. ये वही RSS था जिसने 2014 में मोदी को कंधे पर उठाया था. लेकिन अब मोदी का स्टारडम ऐसा कि वो RSS को थोड़ा साइड करने लगे थे. नीतियां बनतीं, तो RSS को पहले नहीं पूछा जाता. संगठन के लोग कहते “मोदी अब अपने ब्रांड के पीछे चल रहे हैं, हमारी सुनते कहां हैं?”

After the setback in 2024 election , Narendra Modi enhance  closeness with RSS

RSS ने मोदी को कैसे बनाया?

इस समय मोदी 3.0 सरकार चल रही है। RSS का प्रभाव अभी भी है. अमित शाह, राजनाथ सिंह जैसे नेता संघ के करीबी हैं, लेकिन तनाव भी है. मिसाल के तौर पर, हाल ही में नागरिकता संशोधन एक्ट लागू हुआ. RSS ने तारीफ की, लेकिन किसान आंदोलन पर चुप्पी साध ली. Modi सरकार पर दबाव था, लेकिन RSS ने खुलकर साथ नहीं दिया. फिर भी, दोनों का रिश्ता टूटा नहीं. क्यों? क्योंकि RSS को अपनी विचारधारा के लिए भाजपा चाहिए, और मोदी को संगठन की जमीनी ताकत. RSS ने मोदी को अनुशासन दिया, हिंदुत्व का रास्ता दिखाया, और 2014 में जमीनी ताकत से उन्हें PM की कुर्सी तक पहुंचाया. स्वयंसेवकों ने रात-दिन मेहनत की. मोदी RSS के सिपाही से “ब्रांड मोदी” बन गए.

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